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बाल संत राम कल्याण जी रामस्नेही "बालक"


बाल संत श्री राम कल्याण जी रामस्नेही "बालक" रामस्नेही संप्रदाय में दीक्षित एक सरल व कर्मठ संत है |
इनका इस संप्रदाय में प्रादुर्भाव १ दिसम्बर २००७ को हुआ |
आपकी दीक्षा महान तपोनिष्ठ संत श्री मुनि जी भगतराम जी "विदेही" के द्वारा १४ वर्ष की उम्र में राजस्थान के भीलवाड़ा शहर स्थित श्री रामद्वारा धाम में अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के वर्तमान पीठाधिश्वर श्री जगतगुरु आचार्य श्री रामदयाल जी महाराज के स्नेहिल सानिध्य में सम्पन्न हुई | और इनको महान गुरु ने रामनाम तारक मंत्र प्रदान किया | तथा इनका पूर्व नाम ( राजाराम कुमावत ) से नवीन नामकरण "रामकल्याण" रामस्नेही के रूप में किया गया |
दीक्षा के बाद करीब दो माह तक ये भीलवाड़ा रामद्वारा धाम में ही संत सानिध्य में रहे |

 

विद्यार्थी जीवन -

 

आपने पूर्व में ८ वी कक्षा में ही स्कूल जाना छोड़ कर संतो का आचरण किया | और जब ये रामस्नेही संप्रदाय में दीक्षित हुए और श्री शांतिलाल जी दाधीच ( गुरु जी ) व अपने प्रिय संत श्री हरिराम जी महाराज नायन की प्रेरणा से इन्होने पुनः शिक्षा अध्ययन का मानस बनाया तथा श्री शांतिलाल जी दाधीच ( गुरु जी ) व संत श्री गौतम राम जी महाराज रामस्नेही के सहयोग व गुरु की आज्ञा से विनायक विद्यापीठ में प्रवेश लेकर पुनः अपनी शिक्षा प्रारंभ की |

 

विनायक विद्यापीठ में

विनायक विद्यापीठ में बालसंत को बड़ा अनुकूल और उर्जापद वातावरण प्राप्त हुआ | यहाँ इनके चहेता बने श्री डॉ. देवेन्द्र जी (निर्देशक विनायक विद्यापीठ ) सहित कई अच्छे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति |
इस दौरान इन्हें वहां निर्वत्ति मार्ग के साथ देश भक्ति का भाव भी प्राप्त हुआ | यहाँ आपको विचार और चिंतन की नई धारा मिली | यहाँ आपने दसवी तक ज्ञानार्जन किया | इस दौरान आप कई खास तथा अविस्मरणीय हस्तियों से मिले जिनसे आपको काफी कुछ सिखने को मिला |
यहाँ ये बहुआयामी व्यक्तित्व के धनि श्री कारोही महाराज , श्री शिवदान सिंह जी राणावत से काफी प्रभावित हुए | इन दोनों के बिच घनिष्ठ प्रेम स्थापित हुआ | यही पर आपने महान विचारक श्री बिन्नू भैय्या से भी भेंट की और उनसे भी बहुत प्रभावित हुए | इसी तरह कई व्यक्तित्व के धनि लोग बालवाटिका के गर्ग जी , श्री राजेंद्र गोपाल जी व्यास , श्री सरयू दास जी महाराज , अशोक जी व्यास , महान विश्व विख्यात ज्योतिषी प. नाथूराम जी व्यास , श्री शांतिलाल जी शुन्य गुरूजी आदि और भी अनेक खास व्यक्तियों से मिले और प्रभावित हुए | यहाँ इनके जीवन में काफी निखार आया | विनायक विद्यापीठ को इनके जीवन रूपी रामकथा का सुन्दर कांड कहा जा सकता है |
इसी तरह आपने यहाँ से १० वि उत्तीर्ण कर गुरु की सेवा में उदयपुर ( डग ) प्रस्थान किया |


गुरु सेवा -

 

गुरु आज्ञा से इन्होने रुनिजा जिला मंदसौर रामद्वारे के जीर्णोधार का भागीरथ प्रयास किया और गुरु कृपा से वह प्रयास सफल हुआ | उसी वर्ष सन २०१० में श्री गुरुदेव और आपने साथ में रुनिजा चातुर्मास किया |
इसी दौरान आपने रुनिजा में "रामावलंबन" नाम से बाल एवं वृद्ध आश्रम की नीव रखी, इस आश्रम हेतु उन्हें रुनिजा के ही द्वारिका प्रसाद भाटी ने अपनी तीन बीघा जमीन प्रदान की |

 

श्री गुरु से चीर वियोग -

 

२०११ में भी इन्होने बाल एवं वृद्ध आश्रम के निर्माण के उद्देश्य को लेकर रुनिजा ही चातुर्मास किया | किन्तु आपके गुरु जी का इस बार चातुर्मास इनके साथ रुनिजा न होकर मंदसौर जिले के सीतामऊ तहसील के गंगाखेड़ी गाँव में था | इसी दौरान इनके गुरु जी अस्वस्थ हुए व वे इनके पास रुनिजा गए | इसी दौरान आश्रम निर्माण कार्य प्रारंभ हो इससे पूर्व इन्होने आश्रम की प्रस्तावित भूमि पर रामकथा का आयोजन साधवी से करवाया | कथा ५ सितम्बर २०११ से प्रारंभ हुई थी जो ११ सितम्बर तक चलने वाली थी |
कर्म और धर्म की परीक्षा पल - पल होती है | कथा के बिच में ही आपके गुरु जी पुनः अस्वस्थ हो गए | और आप आधे गुरु सेवा और आधे आयोजन में बड़ी तपपूर्ण स्थिति से लगे हुए थे | ११ सितम्बर को कथा की पूर्णाहुति हुई और नियति की नियत देखे १२ सितम्बर को इनके गुरु महा परायण कर गए | और "बालक" अकेले रह गए | जीवन से लड़ते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ललक लिए | १३ सितम्बर को इनके श्री गुरु की दिव्य देह को "रामावलंबन" की ही पवित्र भूमि पर इन्होने अपने कोमल हाथो से मुखाग्नि दी | और हजारो लोगो के समक्ष उन्हें चिर विदाई प्रदान की |

२४ सितम्बर २०११ को श्री गुरु का विशाल भंडारा कर अपने कर्तव्य क्रम को पूर्ण किया |
जब इनसे पूछते है की आपको गुरु के समीप बिताया कोनसा पल ज्यादा याद है | तो ये कहते है " गुरु सानिध्य में बिता कोनसा ऐसा पल हे जो यादगार न हो "
फिर भी मुझे उनके साथ की गयी बद्रीविशाल की तीर्थ यात्रा हमेशा याद रहेगी |